Wednesday, October 13, 2010

खत लिख दे संवरिया के नाम बाबू....आशा की मासूम गुहार एल पी के सुरों में ढलकर जैसे और भी मधुर हो गयी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 504/2010/204

क्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीतबद्ध गीतों की शृंखला 'एक प्यार का नग़मा है' की चौथी कड़ी में आज आवाज़ आशा भोसले की। युं तो लक्ष्मी-प्यारे के ज़्यादातर गानें लता जी ने गाए हैं, आशा जी के इनके लिए गीत थोड़े कम हैं। लेकिन जितने भी गानें हैं, उनमें आज जो गीत हम आपको सुनवाने के लिए लाए हैं, वह एक ख़ास मुकाम रखता है। यह है फ़िल्म 'आये दिन बहार के' का गीत "ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू, वो जान जाएँगे, पहचान जाएँगे"। दोस्तों, एक ज़माना ऐसा था कि जब फ़िल्मों में चिट्ठी और ख़त पर गानें बना करते हैं। बहुत से गानें हैं इस श्रेणी के। यहाँ तक कि ९० के दशक में भी ख़त लिखने पर कई गीत बनें हैं, मसलन, फ़िल्म 'खेल' का गीत "ख़त लिखना है पर सोचती हूँ", फ़िल्म 'दुलारा' में "ख़त लिखना बाबा ख़त लिखना", फ़िल्म 'बेख़ुदी' में "ख़त मैंने तेरे नाम लिखा, हाल-ए-दिल तमाम लिखा", फ़िल्म 'जीना तेरी गली में' का "जाते हो परदेस पिया, जाते ही ख़त लिखना" आदि। लेकिन २००० के दशक के आते ही ईमेल क्रांति इस समाज पर ऐसे हावी हो गई कि लोग जैसे काग़ज़ पर ख़त लिखना ही भूल बैठे। ज़रा पीछे मुड़कर देखिए और याद कीजिए कि कब आपने काग़ज़ पर अंतिम बार किसी को पत्र लिखा था। मुझे याद है साल २००३ के बाद ना मैंने अपने किसी मित्र को पत्र लिखा और ना ही किसी रेडियो स्टेशन को, जो मैं बचपन से करता आया हूँ। और दोस्तों, क्योंकि हमारी फ़िल्में हमारे समाज का ही आइना होती हैं, इसलिए ख़तों का ज़िक्र फ़िल्मी गीतों से भी लुप्त हो गया। आज किसी फ़िल्म में ख़त लिखने की बात नहीं होती। दूसरे और पहलुओं की तरह यह कोमल और मासूम सा पहलु भी फ़िल्मी गीतों से ग़ायब हो गया। हमें यक़ीन है कि आज के इस गीत को सुनते हुए आपको वह ख़त लिखने का ज़माना ज़रूर याद आ जाएगा। इस गीत का शुरुआती शेर भी बड़ा ख़ूबसूरत है जिसमें गीतकार आनंद बक्शी साहब कहते हैं कि "अब के बरस भी बीत ना जाए ये सावन की रातें, देख ले मेरी ये बेचैनी और लिख दे दो बातें"।

आशा भोसले ने यह गीत पर्दे पर फ़िल्म की नायिका आशा पारेख के लिए गाया था। आशा जी की आवाज़ की जो ख़ास बातें हैं, जो लचक है, जो शोख़ी है, वो इस गीत में साफ़ साफ़ सुनाई देती है। गीत को सुनते हुए जैसे सचमुच ऐसा लगता है कि कोई गाँव की लड़की ही गीत को गा रही है। शायद उनकी इसी खासियत के लिए एल.पी ने यह गीत लता जी के बजाए आशा जी से गवाना बेहतर समझा। वैसे एल.पी आशा जी से थोड़े दूर दूर ही रहे हैं। लीजिए यही बात प्यारेलाल जी के शब्दों में ही जान लीजिए जो वो बता रहे हैं विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में।

कमल शर्मा: प्यारे जी, लता जी की बहन आशा जी, वो भी बहुत वर्सेटाइल, और उन्होंने भी बहुत योगदान दिया है फ़िल्म संगीत को। और उन्होंने भी गानें आपके संगीत निर्देशन में गाए हैं। आशा जी का कैसे मूल्यांकन करते हैं, कैसे उनकी प्रतिभा का?

प्यारेलाल: क्या बात है, दरअसल क्या है, देखिए, ये दो दो अक्षर जो हैं, ये बहुत कम होते हैं, ये लता जी जो हैं, ऐसे ही मैं आशा जी के लिए बात कर रहा हूँ, वैसे ही रफ़ी साहब। लता, दो अक्षर, आशा, दो अक्षर, रफ़ी, दो अक्षर, ऐसे नहीं, और भी हैं, लेकिन आशा जी की क्या बात है! वैसे हमें कम मौका मिला उनके साथ गाना करने का, और उनके गानें हम जो सुनते हैं, हमारे भी सुनते हैं और भी जो उन्होंने गाये हैं, वो भी सुनते हैं, तो उनमें कितनी ख़ूबियाँ हैं, सब गानें अच्छे, बहुत अच्छे गाये हैं। क्या है ना, हम लोग भी थोड़े से वो हैं, कि जो अच्छे गानें हैं लता जी को दे देते हैं, और जो ऐसे गानें हैं, वो हमारी ग़लती है, लेकिन हमारे लिए जैसे लता जी, वैसे आशा जी। आशा जी को मैं उतनी इज़्ज़त देता हूँ जितनी लता जी को देता हूँ, फ़रक इतना है कि हमने उनके साथ काम कम किया है, लेकिन अगर आप दोनों को तोलें तो दोनों १००% गोल्ड हैं। लता जी अगर लता जी हैं तो आशा जी आशा जी हैं। इतना है कि हम आशा जी से थोड़ा डरते हैं, बहुत ग़ुस्सेवाली हैं वो।

कमल शर्मा: प्यारे जी, कोई गाना जो उन्होंने आपके लिए गाया और आपको बहुत पसंद है?

प्यारेलाल: "ख़त लिख दे"

तो लीजिए दोस्तों, प्यारेलाल जी का फ़ेवरीट आशा नंबर हम सब मिलकर सुनते हैं। फ़िल्म 'आये दिन बहार के' के तमाम डिटेल्स हम पहले ही आपको उस दिन दे चुके हैं जिस दिन इस फ़िल्म का शीर्षक गीत आपको सुनवाया था कड़ी क्रमांक ३७० में। बस इतना बताते चलें कि यह गीत खमाज पर आधारित है।



क्या आप जानते हैं...
कि 'आये दिन बहार के' (१९६६) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत सफ़र की बड़े सितारों वाली पहली महत्वपूर्ण फ़िल्म थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०३ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के पहले इंटरल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र -१९६७ की फिल्म है ये, और गीत है मुकेश की आवाज़ में, और भी कुछ सूत्र हैं जो नीचे के प्रश्नों में छुपे हैं, ढूंढ निकालिए

सवाल १ - गीतकार वो हैं जिन्होंने मदन मोहन साहब के साथ बहुत अधिक काम किया है, नाम बताएं- १ अंक
सवाल २ - फिल्म का शीर्षक नायिका के नाम पर ही है, नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - नायक, नायिका के चाँद से चेहरे की तारीफ़ कर रहा है गीत में, किस अभिनेता पर फिल्माया गया है ये गीत - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
सुकान्त जी आपका महफ़िल में आना बेहद सुखद लगा, आपने पहेली से पहले कुछ जानकारियाँ भी बांटी, जिसकी हमें हर श्रोता से उम्मीद रहती है, बस जरा नियमों को पढ़ने में चूक कर गए. इस बार तो आपको अंक नहीं दे पायेंगें पर उम्मीद करेंगें कि आप आगे भी सही जवाब देकर हम सब का दिल जीत लेंगें, और शरद जी जो अब ६ अंकों पर हैं उन्हें टक्कर दे पायेंगें बिलकुल वैसे ही जैसे इस वक्त श्याम कान्त (२) जी व अन्य प्रतिभागी दे रहे हैं, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

11 comments:

  1. बिट्टू (Bittu)October 13, 2010 at 7:03 AM

    1:-) Aarzoo Lakhanawi

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  2. बिट्टू (Bittu)October 13, 2010 at 7:05 AM

    1:-) Aarzoo Lakhanawi

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  3. बिट्टू (Bittu)October 13, 2010 at 7:05 AM

    1:-) Aarzoo Lakhanawi

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  4. सवाल १ - गीतकार वो हैं जिन्होंने मदन मोहन साहब के साथ बहुत अधिक काम किया है, नाम बताएं- १ अंक
    Raja Mehdi Ali Khan

    Pratibha K-S.
    Ottawa, Canada

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  5. सुकान्तOctober 13, 2010 at 8:26 AM

    सजीव सारथी जी, पुरस्कार जाने दीजिये, मेरे लिये तो आपका साथ अधिक प्यारा है..

    सवाल 1 - गीतकार - राजा मेहंदी अली खान साहब
    सवाल २ - अनीता
    सवाल ३ - फिल्माया गया है मनोज कुमार के ऊपर
    गीत - गोरे गोरे चांद से मुख पर

    एक बात और, मदन मोहन जी के साथ सबसे
    अधिक काम राजेन्द्र कृष्ण जी ने किया है. लेकिन मदन मोहन साहब के गीत हिट अधिक राजा मेहंदी अली खान जी के साथ हुये हैं.

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  6. कुछ दिनों तक कार्यक्रमों में व्यस्त होने के कारण समय पर उपस्थित नहीं हो पा रहा हूँ । खुशी है अब नए लोग इसमें जुडते जा रहे है ।

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  7. 3 = Mithun Chakraborty

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  8. पिछले तीन दिन से 'travelling' के कारण आवाज़ की महफ़िल में हाजिरी नहीं लगा पाया था. अभी घर लौट कर सबसे पहला काम यही किया.
    तीनों प्रश्नों के उत्तर तो आ ही चुके हैं.फिल्म अनीता में अधिकतर गाने तो राजा मेहदी अली खान साहेब के थे इसलिए सुकांत जी को शायद भ्रम हुआ हो पर जहाँ तक मेरी जानकारी है इस गाने के रचयिता आरजू लखनवी साहेब ही थे.[मेरे ही शहर के :-)]
    अवध लाल

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  9. जो भी हो विश्वजीत और मनोज कुमार ने सबसे ज्यादा रहस्यमयी फिल्म्स में काम किया था जिनके गाने भी बेहद मधु थे.मैं तो वो कौन थी के गानों को आज भी नही भूलती.
    'खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबु...' गाने में एक बड़ी प्यारी पंक्ति है जिसे आज भी सुनती हूँ चेहरे पर एक मुस्कराहट फ़ैल जाती है '.......सामने हो तो कोई उनसे रूठे,ले गई बैरन शहर पिया को,राम करे कि ऐसी नौकरी छूटे....हा हा हा

    कितनी मासूमियत,भोलापन और एक निश्छल इच्छा.मैं तो कुर्बान इस भाव पर भी और गाना,नायिका,गायिका सब पर.
    बाप रे सब पर? यस .क्या करूं ? ऐसीच हूँ मैं तो

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