'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ'। इसके दूसरे खण्ड में इस हफ़्ते आप पढ़ रहे हैं सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार महबूब ख़ान के फ़िल्मी सफ़र के बारे में, और साथ ही साथ सुन रहे हैं उनकी फ़िल्मों के कुछ सदाबहार गानें और उनसे जुड़ी कुछ बातें। आइए आज उनकी फ़िल्मी यात्रा की कहानी को आगे बढ़ाते हैं ४० के दशक से। द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न अस्थिरता के लिए सागर मूवीटोन को भी कुर्बान होना पड़ा। कंपनी बिक गई और नई कंपनी 'नैशनल स्टुडिओज़' की स्थापना हुई। 'सागर' की अंतिम फ़िल्म थी १९४० की 'अलिबाबा' जिसका निर्देशन महबूब ख़ान ने ही किया था। नैशनल स्टुडिओज़ बनने के बाद महबूब साहब इस कंपनी से जुड़ गये और इस बैनर पे उनके निर्देशन में तीन महत्वपूर्ण फ़िल्में आईं - 'औरत' (१९४०), 'बहन' (१९४१) और 'रोटी' (१९४२)। 'सागर' और 'नैशनल स्टुडिओज़' के जितनी भी फ़िल्मों की अब तक हमने चर्चा की, उन सभी में संगीत अनिल बिस्वास के थे। अनिल दा महबूब साहब के अच्छे दोस्त भी थे। 'औरत' फ़िल्म की कहानी एक ग़रीब मज़दूर औरत की थी जिसे अमीर ज़मीनदारों का शोषण सहना पड़ता है। सरदार अख़्तर और सुरेन्द्र अभिनीत इसी फ़िल्म का रीमेक थी 'मदर इण्डिया'। 'औरत' में अनिल दा का गाया "काहे करता देर बाराती" ख़ूब चला था। 'अलिबाबा' मे सुरेन्द्र और वहीदन बाई का गाया "हम और तुम और ये ख़ुशी" भी उस दौर का एक लोकप्रिय गीत था। महबूब साहब ने अपनी फ़िल्मों में ग़रीबों पर हो रहे शोषण को बार बार उजागर किया है। १९४२ की फ़िल्म 'रोटी' में भी ग़रीब जनजाति के लोगों पर हो रहे अमीर उद्योगपतियों द्वारा अत्याचार का मुद्दा उठाया गया था। संगीत के पक्ष से भी 'रोटी' हिंदी सिनेमा का एक उल्लेखनीय फ़िल्म है क्योंकि इस फ़िल्म में महबूब ख़ान और अनिल बिस्वास ने बेग़म अख़्तर को गाने के लिए राज़ी करवा लिया था। उन दिनों बेग़म अख़्तर फ़िल्मों में नहीं गाती थीं, लेकिन इस फ़िल्म के लिए उन्होंने कुछ ग़ज़लें गाईं। १९४३ में महबूब ख़ान ने अपने करीयर का रुख़ मोड़ा और नैशनल स्टुडिओज़ से इस्तीफ़ा देकर अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'महबूब प्रोडक्शन्स' की स्थापना की। संगीतकार रफ़ीक़ ग़ज़नवी को लेकर इस साल उन्होंने दो फ़िल्में बनाईं - 'नजमा' और 'तक़दीर'। १९४५ में महबूब ख़ान प्रोडक्शन्स की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक फ़िल्म आई - 'हुमायूँ'। इस फ़िल्म मे मास्टर ग़ुलाम हैदर को चुना गया संगीतकार। इस फ़िल्म में शम्शाद बेगम के गाये गानें ख़ूब लोकप्रिय हुए थे। और फिर आया साल १९४६ और इस साल महबूब ख़ान ने बनाई अब तक की उनकी सब से सफलतम फ़िल्म 'अनमोल घड़ी', और इसी फ़िल्म से वो जुड़े नौशाद साहब से, और आगे चलकर उनकी हर फ़िल्म में नौशाद साहब ने संगीत दिया। महबूब और नौशाद साहब ने 'अनमोल घड़ी' से जो संगीतमय सफल फ़िल्मों की परम्परा शुरु की, वो अंत तक जारी रहा। नूरजहाँ, सुरेन्द्र और सुरैय्या अभिनीत यह फ़िल्म ब्लॊकबस्टर साबित हुई और फ़िल्म के गानें ऐसे लोकप्रिय हुए कि "जवाँ है मोहब्बत" और "आवाज़ दे कहाँ है" जैसे गीत आज तक लोग सुनते रहते हैं। ४० के दशक की बाक़ी की तीन फ़िल्में हैं - 'ऐलान', 'अनोखी अदा' और 'अंदाज़', जिनकी चर्चा हम परसों की कड़ी में कर चुके हैं।
दोस्तों, युं तो महबूब ख़ान की फ़िल्मों में अनिल बिस्वास, रफ़ीक़ ग़ज़नवी, ग़ुलाम हैदर जैसे दिग्गज संगीतकारों ने संगीत दिया है, लेकिन सब से ज़्यादा जिस संगीतकार के साथ उनकी ट्युनिंग् जमी थी वो थे नौशाद साहब, और शायद इसी ट्युनिंग का नतीजा है कि नौशाद साहब के साथ बनाई हुई फ़िल्मों के गानें ही सब से ज़्यादा लोकप्रिय हुए। इसलिए इस शृंखला में हम बातें भले ही हर दशक के कर रहे हैं, लेकिन गानें नौशाद साहब के ही सुनवा रहे हैं। और आज का जो गीत हमने चुना है वह है १९५४ की फ़िल्म 'अमर' की एक भजन "इंसाफ़ का मंदिर है ये, भगवान का घर है"। रफ़ी साहब की पाक़ आवाज़, शक़ील बदायूनी के दिव्य बोल। आइए आज भी नौशाद साहब की ज़ुबानी महबूब ख़ान से जुड़ी कुछ बातें जानी जाए। "एक दिन रेकॊर्डिस्ट कौशिक मेरे घर में आए महबूब साहब के तीनों बेटों को लेकर। कहने लगे कि आप उस वक़्त मौजूद नहीं थे जब महबूब साहब का इंतकाल हुआ था। महबूब साहब ने अपनी वसीयत में लिखा है कि "नौशाद साहब को उतनी रकम दी जाए जितनी वो माँगते हैं। नौशाद ने मेरी बहुत सी फ़िल्में बिना पैसे लिए किए हैं, इसलिए उन्हें उनका महनताना मिलना ही चाहिए, नहीं तो मैं अल्लाह का कर्ज़दार रहूँगा।" मैंने कहा कि महबूब साहब के साथ मेरा प्रोफ़ेशनल रिलेशन नहीं था, हम लोग एक परिवार के सदस्य थे। मैंने 'मदर इण्डिया', 'अनोखी अदा' वगेरह फ़िल्मों के लिए पैसे नहीं लिए, लेकिन अब जब वो इस दुनिया में नहीं रहे, तो मैं पैसे माँगने की सोच भी नहीं सकता, यह चैप्टर अब कोल्ज़ हो चुका है। उनके इंतेकाल के बाद स्टुडिओ जाना अच्छा नहीं लगता था, उनकी याद आती थी। मैंने महबूब साहब से बहुत कुछ सीखा, यहाँ तक कि नमाज़ पढ़ना भी। मैंने उन्हें लंदन जाते समय फ़्लाइट में नमाज़ पढ़ते देखा है। मैंने उनकी बातों से इन्स्पायर्ड हो जाता था। अपनी फ़िल्मों के लिए वो जिस तरह के विषय चुनते थे, यह कोई महान आदमी ही कर सकता है। ऐसा आदमी बार बार जन्म नहीं लेत। उन्हें यह भी मालूम था कि अपना नाम कैसे लिखते हैं, लेकिन जब लेखकों के साथ बैठते थे तो कभी कभी ऐसे आइडियाज़ कह जाते थे कि जिनके बारे में किसी ने नहीं सोचा। किसी ने कहा कि कलम फेंक दे यार, ये ज़ाहिल आदमी ने जो सोच लिया हम नहीं सोच पाए। ये महबूब ख़ान ही थे जिन्होंने फ़ॊरेन मार्केट खोल दी, फ़ॊरेन डिस्ट्रिब्युटर्स ले आये, अपनी फ़िल्म 'आन' से। और 'मदर इण्डिया' से फ़ॊरेन टेरिटरी खोल दी।" महबूब साहब के बारे में आज बस यहीं तक, आइए अब आज का गीत सुना जाए रफ़ी साहब की आवाज़ में, फ़िल्म 'अमर' से। यह गीत आधारित है राग भैरवी पर।
क्या आप जानते हैं...
कि नौशाद ने एक बार कहा था कि "जिसको मैं कह सकूँ कि यह मेरा पसंदीदा गाना है, अभी तक वह नहीं आया, मैं यह सोच कर काम नहीं करता कि लोगों को पसंद आएगा कि नहीं, जो मुझे अच्छा लगता है मैं वही करता हूँ। कभी कोने में बैठ कर कोई गाना बनाया और ख़ुद ही रोने लगता।
दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)
पहेली 8 /शृंखला ०४
गीत का प्रील्यूड सुनिए -
अतिरिक्त सूत्र - इस सुपर डुपर हिट फिल्म के क्या कहने.
सवाल १ - किन किन पुरुष गायकों की आवाज़ है इस समूह गीत में - २ अंक
सवाल २ - महिला गायिकाओं के नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
पिछली पहेली का परिणाम -
कल तो श्याम कान्त जी और शरद जी के बीच टाई हो गया, परंपरा अनुसार हम दोनों को ही २-२ अंक दे रहे हैं, यानी मुकाबला अभी भी कांटे का ही है, अमित जी और अवध जी १-१ अंक की बधाई....इंदु जी आप तो आ जाया कीजिए, आपको देखकर ही हम तो खुश हो जाते हैं....कितने लोग हैं दुनिया में जो आपकी तरह मुस्कुरा सकते हैं
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
1 mohd Rafi , manna dey
ReplyDelete2-Shamshad Begum, Asha Bhosle
ReplyDeleteफिल्म: मदर इंडिया
ReplyDeleteदुःख भरे दिन बीते रे भैया
अवध लाल
aafreen!Nihayat sureela hai ye Bhajan.
ReplyDelete'आज तो जी भर झूम ले पागल कल ना जाने क्या होए....' अपनी तो जिंदगी का फलसफा रही है ये पंक्तियाँ.और...हम है राही प्यार के हमसे कुछ ना बोलिए जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए.
ReplyDeleteहा हा हा
सचमुच ऐसीच हूँ मैं.ना विदुषी ना पूजा पाठ करने वाली.पर...सबको बहुत प्यार करती हूँ.आपने याद किया.बहुत अच्छा लगा.यही सब छोड़ कर जाना चाहती हूँ ...कि लोग कहे 'वो सचमुच एक अच्छी औरत थी.....और कुछ नही ...'प्यार' शब्द ही मुझे भावुक कर देता है क्योंकि मेरे लिए प्यार ईश्वर की पूजा है.ईश्वर का दूसरा नाम है.
क्या करूं?ऐसिच हूँ मैं.