रेडियो प्लेबैक वार्षिक टॉप टेन - क्रिसमस और नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित


ComScore
प्लेबैक की टीम और श्रोताओं द्वारा चुने गए वर्ष के टॉप १० गीतों को सुनिए एक के बाद एक. इन गीतों के आलावा भी कुछ गीतों का जिक्र जरूरी है, जो इन टॉप १० गीतों को जबरदस्त टक्कर देने में कामियाब रहे. ये हैं - "धिन का चिका (रेड्डी)", "ऊह ला ला (द डर्टी पिक्चर)", "छम्मक छल्लो (आर ए वन)", "हर घर के कोने में (मेमोरीस इन मार्च)", "चढा दे रंग (यमला पगला दीवाना)", "बोझिल से (आई ऍम)", "लाईफ बहुत सिंपल है (स्टैनले का डब्बा)", और "फकीरा (साउंड ट्रेक)". इन सभी गीतों के रचनाकारों को भी प्लेबैक इंडिया की बधाईयां

Thursday, April 29, 2010

किस अदा से ज़ीनत का दूँ हर शै को पता- पाँचवा ताज़ा गीत



Season 3 of new Music, Song # 05

आवाज़ के लिए शुक्रवार का मतलब होता है बिलकुल ताज़ा। खुद के लिए और श्रोताओं के लिए ताज़े संगीत से सजे एक गीत को प्रस्तुत करना। संगीतबद्ध गीतों का तीसरा सत्र जो हमारे बिना किसी प्रयास के नये संगीतकारों-गायकों-लेखकों में आवाज़ महोत्सव 2010 के रूप में जाना जाने लगा है, में अब तक 4 नये गीत रीलिज हो चुके हैं। पाँचवें गीत के माध्यम से हम एक बिल्कुल नया संगीतकार सतीश वम्मी आवाज़ की दुनिया को दे रहे हैं। इस गीत के रचयिता आवाज़ के जाने-माने स्तम्भकार हैं जो किसी एक ग़ज़ल पर इतनी चर्चा करते हैं कि इंटरनेट पर कहीं एक जगह इतना-कुछ मिलना लगभग असम्भव है। गीत की आत्मा यानी गायिका कुहू गुप्ता 'जो तुम आ जाते एक बार' और 'प्रभु जी' से श्रोताओं के दिल में निवास करने लगी हैं।

गीत के बोल -

मुखड़ा :

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

तू बता मैं किस अदा से
ज़ीनत का दूँ हर शै को पता..
तू बता जो इस फ़िज़ा को
ज़ीनत सौंपूँ तो होगी ख़ता?

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

अंतरा 1:

है ये मेरे तक हीं,
ज़ीनत है ये किसकी
आखिर तेरा है जादू छुपा...

मैं तो मानूँ मन की
ज़ीनत जो है चमकी
आखिर तेरी हीं है ये ज़िया...

तू जाने कि तूने हीं दी है मुझे,
ये ज़ीनत कि जिससे मेरा जी सजे,
तो क्यों ना मेरा जी गुमां से भरे?
तो क्यों ना मैं जी लूँ उड़ा के मज़े?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

अंतरा 2:

यूँ तो फूलों पर भी,
ज़ीनत की लौ सुलगी,
लेकिन जी की सी ज़ीनत कहाँ?

जैसे हीं रूत बदली,
रूठी ज़ीनत उनकी,
लेकिन जी की है ज़ीनत जवाँ..

जो फूलों से बढके मिली है मुझे,
ये ज़ीनत जो आँखों में जी में दिखे,
तो क्यों ना मैं बाँटूँ जुबाँ से इसे?
तो क्यों ना इसी की हवा हीं चले?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

तू बता मैं गुलसितां से
ज़ीनत माँगूँ या कर दूँ अता....



मेकिंग ऑफ़ "ज़ीनत" - गीत की टीम द्वारा

सतीश वम्मी: "ज़ीनत" इंटरनेट की जुगलबंदी से बनाया मेरा पहला गाना है। इस गाने से न सिर्फ़ हम तीन लोग जुड़े हैं बल्कि तीन और लोगों का इसमें बहुत महत्वपूर्ण हाथ है: के के (गिटार, विशाखापत्तनम), श्रीकांत (बांसुरी, चेन्नई), शंपक (मिक्सिंग इंजीनियर, कोलकाता)। मैंने इन तीनों का साथ की-बोर्ड पर दिया है। बदकिस्मती है कि मैं अपनी टीम में से किसी से नहीं मिला हूँ, लेकिन आने वाले समय में इनसे जरूर मिलना चाहूँगा। मुझे याद है कि मैंने पहला डेमो जब विश्व को भेजा था तो उसमें अंतरा नहीं था। हमने सोचा कि हम पूरे गाने में केवल मुखड़े के ट्युन को नए शब्दों के साथ दुहराते रहेंगे। लेकिन जब विश्व ने मुझे इस गाने का मूल-भाव (थीम) बताया (ज़ीनत = आंतरिक और बाह्य... दोनों तरह की सुंदरता) तो मुझे लगा कि इस गाने को और भी खूबसूरत बनाया जा सकता है और फिर हमने इसमें दो अंतरे जोड़े। विश्व को धुन(गाने की ट्युन) की बारीकियों की अच्छी खासी समझ है और वे हर बार ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जो धुन पर पूरी तरह से फिट आते हैं। कुहू की गायकी का मैं पहले से हीं कायल रहा हूँ, मैंने उनके गाने मुज़िबू पर सुने थे, लेकिन कभी उनसे बात नहीं हुई थी। मुझे आज भी याद है कि जब मैंने और विश्व ने ये निर्णय लिया था कि यह गाना कुहू हीं गाएँगी तो मैं उनकी हाँ सुनने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। मैं इससे ज्यादा क्या कहूँ कि कुहू ने इस गाने को एक नई ऊँचाई दी है। मुझे उम्मीद है कि आप सबों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा।

कुहू गुप्ता: सतीश के साथ ये मेरा पहला गाना है और हमेशा याद रहेगा. इनका परिचय मुझे विश्व ने करवाया जब सतीश उनके फीमेल सोलो गाने के लिए आवाज़ तलाश रहे थे. विश्व के साथ में पहले बहुत गाने कर चुकी हूँ लेकिन इस बार टीम में सतीश नए थे. हमेशा की तरह शुरू में उनसे बातचीत बहुत ही औपचारिक तौर पर हुई लेकिन जल्दी ही गाने पर साथ काम करते हुए हमें मज़ा आने लगा. जीनत एक बहुत ही सुन्दर रचना है जिसे आँखें बंद करके सुना जाए तो मन को शान्ति का अनुभव होता है. इस सुन्दर रचना को और मज़बूत बनाने के लिए विश्व की कलम ने बखूबी साथ दिया. इस गाने के शब्द मुश्किल ज़रूर हैं लेकिन जैसा कि गाने का नाम है जीनत यानी खूबसूरती, एक एक शब्द बहुत ही खूबसूरती से चुना गया है. अभी तक जितनी भी मूल रचनाएँ मैंने कि हैं उसमे से ये गाना मुझे इसलिए ख़ास याद रहेगा क्योकि ये पहला ऐसा गाना था जिसका अरेंजमेंट मेरे गाना गाने के बाद पूरा हुआ, जिसे मैं मज़ाक में रहमान स्टाइल कहती हूँ. अरेंजमेंट और गायन दोनों ही साथ साथ विकसित हुए जो मेरे लिए एक नया अनुभव था. इस गीत में हमेशा की तरह प्रयोग किये जाने वाले synthesizer के अलावा लाइव बांसुरी और गिटार का भी प्रयोग किया गया है जो गीत की खूबसूरती को और निखारता है।

विश्व दीपक: भले हीं यह लगे कि सतीश जी के साथ "ज़ीनत" मेरा पहला गाना है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि किसी और गाने के बीच में "ज़ीनत" की धुन निकल आई थी। दर-असल सतीश जी के पास बरसों से एक ट्युन पड़ी थी जिसे उन्होंने "डियर लिरिसिस्ट" नाम दिया था। उन्हें इस ट्युन के लिए किसी हिन्दी-गीतकार की ज़रूरत थी। सतीश जी ने मुझे मुज़िबू पे ढूँढा और मैंने उनकी यह धुन ढूँढ ली। मैंने कहा कि हाँ मैं लिखूँगा। फिर इस तरह से हमारा "बेशक" (अगला गाना जो इस गाने के बाद रीलिज होने वाला है) बनके तैयार हुआ। तब तक हमने यह सोचा नहीं था कि यह गाना किसे देना है , उसी बीच सतीश जी "ज़ीनत" की ट्युन लेकर हाज़िर हुएँ और हम "बेशक" को रोक कर "ज़ीनत" में जुड़ गए। गाना जब आधा हुआ तभी सतीश जी ने पूछा कि आपके लिए "मन बता" जिन्होंने गाया है वो हमारा यह गाना गाएँगी। मैंने कहा कि मैं उनसे बात कर लेता हूँ और मुझे पक्का यकीन है कि वो ना नहीं कहेंगीं। फिर मैंने कुहू जी से बात की और कुहू जी ने लिरिक्स पढने और ट्युन सुनने के बाद हामी भर दी। फिर क्या था गाने पर काम शुरू हो गया और महज़ ७ या फिर १० दिनों में गाना बनकर तैयार भी हो गया। यह होली के आस-पास की घटना है। अब आप सोचेंगे कि गाना जब तभी हो गया था तो इतनी देर कहाँ लगी तो इसमें सारा दोष सतीश जी का(कुछ हद तक शंपक का भी, जो गाने की मिक्सिंग को परफ़ेक्ट करने में लगे थे) है :) वे अपने गाने से संतुष्ट हीं नही होते और इस गाने को अंतिम रूप देने में उन्होंने डेढ महीना लगा दिया। खैर कोई बात नहीं... वो कहते हैं ना कि इंतज़ार का फल मीठा होता है तो हमें इसी मीठे फल का इंतज़ार है। उम्मीद करता हूँ कि "न हम आपको निराश करेंगे और न आप हीं हमें निराश करेंगे।"

सतीश वम्मी
सतीश वम्मी मूलत: विशाखापत्तनम से हैं और इन दिनों कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं। बिजनेस एवं बायोसाइंस से ड्युअल मास्टर्स करने के लिए इनका अमेरिका जाना हुआ। 2008 में डिग्री हासिल करने के बाद से ये एक बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी में काम कर रहे हैं। ये अपना परिचय एक संगीतकार के रूप में देना ज्यादा पसंद करते हैं लेकिन इनका मानना है कि अभी इन्होंने संगीत के सफ़र की शुरूआत हीं की है.. अभी बहुत आगे जाना है। शुरू-शुरू में संगीत इनके लिए एक शौक-मात्र था, जो धीरे-धीरे इनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है। इन्होंने अपनी पढाई के दिनों में कई सारे गाने बनाए जो मुख्यत: अंग्रेजी या फिर तेलगु में थे। कई दिनों से ये हिन्दी में किसी गाने की रचना करना चाहते थे, जो अंतत: "ज़ीनत" के रूप में हम सबों के सामने है। सतीश की हमेशा यही कोशिश रहती है कि इनके गाने न सिर्फ़ औरों से बल्कि इनके पिछले गानों से भी अलहदा हों और इस प्रयास में वो अमूमन सफ़ल हीं होते हैं। इनके लिए किसी गीत की रचना करना एक नई दुनिया की खोज करने जैसा है, जिसमें आपको यह न पता हो कि अंत में हमें क्या हासिल होने वाला है, लेकिन रास्ते का अनुभव अद्भुत होता है।


कुहू गुप्ता
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका तीसरा गीत है।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Zeenat
Voices - Kuhoo Gupta
Music - Satish Vammi
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Samarth Garg


Song # 05, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

इस गीत का प्लेयर फेसबुक/ऑरकुट/ब्लॉग/वेबसाइट पर लगाइए

फेसबुक-श्रोता यहाँ टिप्पणी करें
अन्य पाठक नीचे के लिंक से टिप्पणी करें-

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

4 श्रोताओं का कहना है :

Biswajeet का कहना है कि -

Kuhoo ji aapki awaz bahut mithi lagi, Ye song bahut achha bana hai.. simply mellifluous.. sabhi ko badhaai... Congratulations to the whole team.

anjana का कहना है कि -

congrats to all.singing mithas se bhari hui hai.geet ke bol bahut hi sunder hain.music ke to kya kahne.very soft music and superb singing.....
mompa

Anonymous का कहना है कि -

The most PROFESSIONAL WORK I HAVE EVER HEARD ON THIS PAGE IS THIS. This music is soul stirring and beautiful. Everything is well balanced. The music, the lyrics, the mixing.
Thank you for giving us good music.

J.M. SOREN

Anonymous का कहना है कि -

bahut bahut shukriya :)
Kuhoo

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

संग्रहालय

25 नई सुरांगिनियाँ