रेडियो प्लेबैक वार्षिक टॉप टेन - क्रिसमस और नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित


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प्लेबैक की टीम और श्रोताओं द्वारा चुने गए वर्ष के टॉप १० गीतों को सुनिए एक के बाद एक. इन गीतों के आलावा भी कुछ गीतों का जिक्र जरूरी है, जो इन टॉप १० गीतों को जबरदस्त टक्कर देने में कामियाब रहे. ये हैं - "धिन का चिका (रेड्डी)", "ऊह ला ला (द डर्टी पिक्चर)", "छम्मक छल्लो (आर ए वन)", "हर घर के कोने में (मेमोरीस इन मार्च)", "चढा दे रंग (यमला पगला दीवाना)", "बोझिल से (आई ऍम)", "लाईफ बहुत सिंपल है (स्टैनले का डब्बा)", और "फकीरा (साउंड ट्रेक)". इन सभी गीतों के रचनाकारों को भी प्लेबैक इंडिया की बधाईयां

Sunday, May 2, 2010

न कोई था, न कोई होगा हरफनमौला किशोर दा जैसा



ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १२

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में किशोर कुमार की यादें ताज़ा होंगी। फ़िल्म 'झुमरू' का वही दर्द भरा नग़मा "कोई हमदम ना रहा, कोई सहारा न रहा, हम किसी के न रहे, कोई हमारा न रहा"। गीत मजरूह साहब का और बाकी सब कुछ किशोर दा का। आइए आज इस गीत को एक नए अंदाज़ में सुनने से पहले 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की बीती हुई कड़ियों के सुर सरिता में ग़ोते लगा कर किशोर दा के बारे में कहे गए कुछ बातें ढूंढ निकाल लाते हैं। ये हैं आनंदजी भाई जो बता रहे हैं किशोर कुमार के बारे में विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में:

प्र: अच्छा आनंदजी, किशोर कुमार ने कोई विधिवत तालीम नहीं ली थी, इसके बावजूद भी कुछ लोग जन्मगत प्रतिभाशाली होते हैं, जैसे उपरवाले ने उनको सब कुछ ऐसे ही दे दिया है। उनकी गायकी की कौन सी बात आप को सब से ज़्यादा अपील करती थी?

देखिये, मैने बतौर संगीतकार कुछ ४०-५० साल काम किया है, लेकिन इतना कह सकता हूँ कि 'it should be a matured voice', और यह कुद्रतन होता है। और यहाँ पर क्या है कि कितना भी अच्छा गाते हों आप, लेकिन 'voice quality' अगर माइक पे अच्छी नहीं है तो क्या फ़ायदा! फ़िल्मी गीतों में ज़्यादा मुर्कियाँ लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हमारे यहाँ कुछ गायक हैं जो समझते हैं कि दो मुर्कियाँ ले लूँ तो मेरा गाना चलेगा, लेकिन फिर क्या होता है कि फिर हर वक़्त वो वैसा ही लगते हैं। सिर्फ़ गाना ही होगा, 'ऐक्टिंग्' नहीं। लेकिन एक भोला भाला सीधा सादा आदमी खड़े खड़े ही गाना गा रहा है तो उसी तरह का गाना होना चाहिए। आप को मुड़कियाँ लेने की ज़रूरत नहीं है।

प्र: किशोर कुमार एक हरफ़नमौला, हर फ़न में माहिर एक कलाकार। एक खिलंदरपन था उनमें और बचपना भी। लेकिन जब वो सीरियस गाना गाते थे तो रुला देते थे। और जब वो हास्य का गाना गाते थे तो हँसी के फ़व्वारे छूटने लगते थे।

नहीं नहीं, जैसे आप स्विच बदलते हैं, वो वैसी ही थे। किसी को सीखाने से ये सब आयेगी नहीं। ये अंदर से ही आता है। उनकी 'voice quality' बहुत अच्छी थी। 'ultimate judgement' तो आप को ही लेना है, कि 'मैं सुर में गाऊँ कि नहीं', ये मुझे ही मालूम है। ये जो मैने 'सरगम' की कैसेट निकाली है उसमें यही कहा गया है कि आप अपने बच्चों में अभी से आदत डालेंगे।

प्र: आनंदजी, किशोर दा को जो समय आप देते थे उसमें वो आ जाते थे?

हम लोग उनको दोपहर का 'टाइम' ही देते थे। वो कहते थे कि 'आप के गाने में मुझे कोई प्रौब्लेम नहीं होती'। "ख‍इके पान बनारस वाला" वो दोपहर को गा कर चले गये थे, हम को याद ही नहीं था, क्योंकि पिक्चर के चार गानें बन गये थे, 'रिकार्ड' भी बन कर आ गया था, बाद में यह गाना डाला गया 'सिचुयशन' बनाकर।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - कोई हमदम न रहा...
कवर गायन - दिलीप कवठेकर




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दिलीप कवठेकर
पेशे से इंजिनियर दिलीप कवठेकर मन से एक सहज कलाकार हैं, ब्लॉग्गिंग की दुनिया में अपने संगीत ज्ञान और आवाज़ के लिए खासे जाने जाते हैं, ओल्ड इस गोल्ड निरंतर पढते हैं, गुजरे जमाने के लगभग हर गायक को ये अपनी स्वरांजलि दे चुके हैं


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

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5 श्रोताओं का कहना है :

Kajal Kumar का कहना है कि -

तकनीक तो सिखाई जा सकती है, कला नहीं. किशोर इसके जीते-जागते सबूत थे.

indu puri का कहना है कि -

अरे! दिलीप जी आप?
आप गाते भी हैं ?छुपे रुस्तम निकले भई आप तो.ये तो संजोग से हम फेरी लगाने चले आये.गायक कि आगाह आपका नाम पधा पहले थोडा क्न्फ्युज़ं हुआ,फोतो देखते ही पहचान गए.तो...बधाई आपको,अच्छा गाते हैं आप.
अगर कभी मिल लिए जिंदगी में ना तो ये तो पक्की बात गाने खूब सुनायेंगे एक दुसरे को. हम भी गानों के बेहद शौक़ीन है और पूरे २ इतने गाने गा लेते हैं ना कि खुद आश्चर्य करते हैं कभी कभी जैसे सी.डी .चालू कर दि हो किसी ने.सच्ची इतना शौक है और आपने जो गया न वो किशोर जी के गए उन गानों में से एक है जो हमे बहुत पसंद है 'क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ,जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा ना रहा.'
एक बार फिर ढेर सारी बधाई पूरी टीम को.

AVADH का कहना है कि -

दिलीप जी से बहुत उम्मीद थी और हमेशा की तरह उन्होंने निराश नहीं किया.
आज मन्ना दा(डे) के जन्मदिन पर दिलीप जी की स्वरांजलि भी देखी. मन्ना दा को उतना सत्कार सम्मान नहीं मिला जिसके वोह अधिकारी थे.
मैंने कहीं पढ़ा था और सच भी है कि शब्दों का सही उच्चारण, तलफ्फुज़, बिलकुल दुरुस्त शीन काफ़ किसी को सीखना है तो मन्ना दा के गए सभी गानों से सीखे.
दिलीप जी का बहुत बहुत आभार
अवध लाल

Anonymous का कहना है कि -

bahut khoob dilip ji !
- kuhoo

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन का कहना है कि -

अद्वितीय!
मूल गीत तो सुन्दर है ही, दिलीप की आवाज़ की जादूगरी भी कमाल है. धन्यवाद!

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