रेडियो प्लेबैक वार्षिक टॉप टेन - क्रिसमस और नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित


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प्लेबैक की टीम और श्रोताओं द्वारा चुने गए वर्ष के टॉप १० गीतों को सुनिए एक के बाद एक. इन गीतों के आलावा भी कुछ गीतों का जिक्र जरूरी है, जो इन टॉप १० गीतों को जबरदस्त टक्कर देने में कामियाब रहे. ये हैं - "धिन का चिका (रेड्डी)", "ऊह ला ला (द डर्टी पिक्चर)", "छम्मक छल्लो (आर ए वन)", "हर घर के कोने में (मेमोरीस इन मार्च)", "चढा दे रंग (यमला पगला दीवाना)", "बोझिल से (आई ऍम)", "लाईफ बहुत सिंपल है (स्टैनले का डब्बा)", और "फकीरा (साउंड ट्रेक)". इन सभी गीतों के रचनाकारों को भी प्लेबैक इंडिया की बधाईयां

Saturday, December 6, 2008

कलाकार की कोई पार्टी नही होती - दलेर मेहंदी



सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (६)

टेलंट शो कितने कारगर

एक ज़माने में हुए एक बड़ी "प्रतिभा खोज" के फलस्वरूप हमें मिले थे महेंद्र कपूर, सुरेश वाडकर जिनका हमने पिछले दिनों आवाज़ पर जिक्र किया था वो भी इसी रास्ते से फ़िल्म इंडस्ट्री में आए. १९९६ में "मेरी आवाज़ सुनो" की विजेता थी हम सब की प्रिय सुनिधी चौहान. इसी प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर रही वैशाली सावंत मानती है कि टेलंट शो मात्र आपको दुनिया के सामने प्रस्तुत कर देते हैं असली संघर्ष तो उसके बाद ही शुरू होता है. ख़ुद वैशाली को सात साल लगे प्रतियोगिता के बाद "आइका दाजिबा" तक का सफर तय करने में. रॉक ऑन ने गायन की शुरुआत करने वाली गायिका केरालिसा मोंटेरियो भी मानती हैं कि "आज भी बहुत से नए कलाकार पारंपरिक तरीके से शुरुआत करना पसंद करते हैं. अनुभव आपको इसी से मिलता है कि आप संगीतकारों से मिलें, बात करें और गानों के बनने की प्रक्रिया और उसका मर्म समझें. अक्सर इन प्रतियोगिताओं के विजेता ये मान बैठते हैं कि बस अब मंजिल मिल गई. पर ऐसा नही होता. एक बार शो खत्म होने के बाद उन्हें राह दिखाने वाला कोई नही होता." जो भी हो पर इतना तो तय है कि विभिन्न चैनलों पर चलने वाले इन प्रतियोगिताओं ने नई प्रतिभाओं के प्रति लोगों की सोच अवश्य ही बदली है. अब हर कोई सुनिधी या अभिजीत सावंत जैसा भाग्यशाली भी तो नही हो सकता न...


कलाकार की कोई पार्टी नही होती - दलेर मेहंदी

पिछले दिनों मीडिया ने दिखाया कि अपने दलेर मेहंदी साहब कहीं एक जगह किसी एक पार्टी विशेष का प्रचार कर रहे थे तो कुछ दिनों बाद वो दिखे एक विरोधी पार्टी का गुणगान गाते. ऐसा कैसे और क्यों दिलेर साहब.? पूछने पर दिलेर साहब ने संशय का निवारण किया. "रैली में जिन्हें मीडिया ने दलेर कह कर जनता को बरगलाया वो मेरा भाई शमशेर था, जो एक पार्टी विशेष से टिकट लेकर चुनाव लड़ रहे हैं, ये ठीक है कि बिल्कुल मेरे जैसे लगते हैं और मेरे अंदाज़ के कपड़े पहनते हैं पर रैली में कई बार उनके नाम की उद्घोषणा हुई पर मीडिया ने जान कर मुद्दे को तूल दिया और शमशेर का मायावती जी के पैर छूने की क्लिप्पिंग बार बार ये कह कर दिखाते रहे कि ये दलेर है." तो क्या दलेर साहब अब अपने भाई के उस पार्टी विशेष का प्रचार भी करेंगे. जवाब सुनिए ख़ुद उन्हीं की जुबानी - "कलाकार और डॉक्टर की कोई पार्टी या जात नही होती. मेरा सहयोग अच्छे उम्मीदवार के साथ रहेगा उनकी पार्टी से मुझे कुछ लेना देना नही". अच्छे विचार हैं दलेर जी...


वार्षिक गीतमाला आवाज़ पर

साल खत्म होने को है, इस वर्ष बाज़ार में आए तमाम फिल्मी और गैर फिल्मी गीतों की लम्बी फेहरिस्त में से शीर्ष ५० गीतों को क्रमबद्ध रूप से आपके लिए लेकर आयेंगे हम आवाज़ पर, दिसम्बर २७ तारिख से ३१ तक. आप भी अपने पसंदीदा गीतों की सूची podcast.hindyugm@gmail.com पर हमें भेज सकते हैं. कोशिश करें कि चुराए हुए धुनों पर आधारित गानों को पीछे रख अच्छे और ओरिजनल गीतों को हम इस गीतमाला में स्थान दें. इस सम्बन्ध में और अधिक जानकारी हम जल्द ही आपको उपलब्ध करवायेंगे.

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राज भाटिय़ा का कहना है कि -

द्लेर साहब अब कबुतर वाजी छोड कर इस माया के चरण छु रहे है, भाई सब माया की माया है, अब हम क्या बोले माया सब को प्यारी जो है, कम्बख्त पेट भी तो भरना है, कबुतर ना सही ......
बांबी फ़िल्म का एक गीत शायद इन साहब ने नही सुना , झुठ बोले कोव्वा काटे....अब दिलेर जी सोचेगे इस कोव्वे को केसे पता कोन झुठ बोल रहा है???

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