रेडियो प्लेबैक वार्षिक टॉप टेन - क्रिसमस और नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित


ComScore
प्लेबैक की टीम और श्रोताओं द्वारा चुने गए वर्ष के टॉप १० गीतों को सुनिए एक के बाद एक. इन गीतों के आलावा भी कुछ गीतों का जिक्र जरूरी है, जो इन टॉप १० गीतों को जबरदस्त टक्कर देने में कामियाब रहे. ये हैं - "धिन का चिका (रेड्डी)", "ऊह ला ला (द डर्टी पिक्चर)", "छम्मक छल्लो (आर ए वन)", "हर घर के कोने में (मेमोरीस इन मार्च)", "चढा दे रंग (यमला पगला दीवाना)", "बोझिल से (आई ऍम)", "लाईफ बहुत सिंपल है (स्टैनले का डब्बा)", और "फकीरा (साउंड ट्रेक)". इन सभी गीतों के रचनाकारों को भी प्लेबैक इंडिया की बधाईयां

Wednesday, December 31, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ३० से २१ तक)



वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ३० से २१ तक

पिछले अंक में हम आपको ४०वीं पायदान से ३१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

३० वीं पायदान - मेरी माटी (रामचंद पाकिस्तानी)

पाकिस्तान के जानेमाने निर्देशक महरीन जब्बार ,जिन्होंने पहचान, कहानियाँ, पुतली घर जैसे नामचीन टीवी धारावाहिकों एवं नाटकों का निर्देशन किया है, "रामचंद पाकिस्तानी" लेकर फिल्म-इंडस्ट्री में उपस्थित हुए हैं। यह फिल्म अपने अनोखे नाम के कारण दर्शकों को आकर्षित करती है। नगरपरकर गाँव में रहने वाली "चंपा"(नंदिता दास द्वारा अभिनीत) की जिंदगी में तब उथलपुथल मच जाता है,जब उसका पति एवं उसका लड़का "रामचंद" अनजाने हीं सरहद पारकर भारत आ जाता है और भारतीय फौज उन्हें घुसपैठिया मान लेती है। यह फिल्म उसी चंपा की दास्तान है। देबज्योति मिश्रा द्वारा संगीतबद्ध एवं अनवर मक़सूद द्वारा लिखित "मेरी माटी" गायकों (शुभा मुद्गल एवं शफ़क़त अमानत अली) की अनोखी जुगलबंदी के कारण श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित होती है।



२९ वीं पायदान - बंदया(खुदा के लिए)

यूँ तो बुल्ले शाह की नज़्में साढे तीन सदियाँ पुरानी हैं,लेकिन उनकी नज़्मों का नूर अब भी ताज़ातरीन है। नब्बे की दशक में पाकिस्तानी रौक बैंड "जुनून" ने पहली मर्तबा बुल्ले शाह की नज़्मों को युवाओं के दरम्यान मौजूद कराया था,उसके बाद उनके कलामों पर सबसे ज्यादा काम "रब्बी शेरगिल" ने किया है। "बुल्ला की जाना" इसका जबर्दस्त उदाहरण है। "खुदा के लिए" का "बंदया" भी इसी कड़ी का एक अनमोल मोती है। इस गाने को अपने संगीत से संवारा है खवर जावेद ने तो अपनी गलाकारी से सजाया है खवर जावेद एवं फराह ज़ाला ने।


२८ वीं पायदान - जी करदा(सिंह इज किंग)

आलोचकों की मानें तो प्रीतम ने धुन की चोरी में अन्नु मल्लिक एवं बप्पी लहरी को अगर पीछे नहीं छोड़ा है तो बराबरी तो कर हीं ली है और अगर जनता की माने तो प्रीतम की धुन सबके दिलॊ को अपनी-सी लगती है। इसी उहाफोह के बीच का गीत है "जी करदा"। धुन कितनी मौलिक है,यह तो पता नहीं,लेकिन इसके सूत्रों का अब तक पता नहीं चला है और इसी कारण यह गीत हमारे गीतमाला में शामिल है। "सिंह इज किंग" यूँ तो हाँगकाँग की एक फिल्म "जी जी" की सर से पाँव तक नकल है ,लेकिन अक्षय कुमार की बिंदास अदायगी ने इसे इस साल की दूसरी सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म बना दिया है। रही बात गाने की तो इस गाने के बोल लिखे हैं मयूर पुरी ने और इसे अपनी आवाज़ दी है लभ जंजुआ (सोणी दे नखरे, प्यार करके पछताया फेम) एवं सुज़ी ने।


२७ वीं पायदान -सीता राम सीता राम(वेलकम टू सज्जनपुर)

समानांतर-सिनेमा के बेताज बादशाह श्याम बेनेगल की पहली हल्की-फुल्की एवं पूर्णतया व्यावसायिक फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" आशा के अनुरूप दर्शकों को गुदगुदाने में सफल साबित होती है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे - श्रेयस तालपडे एवं अमृता राव, लेकिन अपनी अदायगी से सबसे ज्यादा प्रभावित किया रवि झंकल ने। इस फिल्म में सामाजिक असामानता एवं राजनीतिक तनावों को हास्य का पुट देकर प्रस्तुत किया गया है एवं हँसाकर हीं सही फिल्म असर तो कर हीं जाती हई। "लगे रहो मुन्नाभाई","खोया खोया चाँद" एवं "लागा चुनरी में दाग" के बाद संगीतकार शांतनु मोइत्रा एवं गीतकार स्वानंद किरकिरे की जोड़ी एक बार फिर अपना कमाल दिखाती है। कृष्ण कुमार की आवाज झूमने पर मजबूर करती है।


२६ वीं पायदान -मम्मा(दसविदानिया)

दिल को छूता कैलाश, नरेश और परेश का संगीत एवं कैलाश के बोल किसी भी संवेदनशील इंसान को रूलाने के लिए काफी है। कैलाश की आवाज एक झटके में असर करती है। इस गाने का फिल्मांकन विनय पाठक, गौरव गेरा एवं सरिता जोशी पर किया गया है और जिस तरह से इन कलाकारों ने अपने इमोशन एक्सप्रेस किए हैं, देखकर हृदय रोमांचित हो जाता है। हैट्स आफ टू कैलाश एंड विनय पाठक..........


२५ वीं पायदान -दिल हारा(टशन)

यूँ तो टशन इस साल की सबसे बड़ी फ्लाप फिल्मों से एक है और आलोचकॊं की मानें तो यश राज फिल्म्स के लिए एक धब्बा है,लेकिन विशाल-शेखर का संगीत डूबते के लिए तिनका साबित होता है। यह साल विशाल-शेखर के लिए बहुत हीं सफल रहा है। "दिल से" एवं "मक़बूल" जैसे फिल्मॊं में अदायगी कर चुके एवं "लीजेंड और भगत सिंह" के पटकथा-लेखक "पियुष मिश्रा" ने इस फिल्म के गीत लिखे हैं। रही बात इस गाने की तो "छप्पन तारे तोर नाच लूँ" की स्वरलहरियाँ जैसे हीं हवाओं में उतरती है, "सुखविंदर" के अज़ीम-ओ-शान आगमन का अंदाजा हो जाता है।


२४ वीं पायदान -मन मोहना(जोधा अकबर)

कुछ सालों पहले जी०टी०वी० के "सा रे गा मा" में (जब सोनु निगम उद्घोषक हुआ करते थे) बेला शिंदे ने अपनी गायिकी से सबको मोहित किया था और विजेता भी हुई थी। लेकिन उसके बाद बेला शिंदे कुछ खास नहीं कर पाई। इस साल आई
"जोधा अकबर" से इस गायिका ने अपनी वापसी की है। "मन मोहना" यूँ तो एक भजन है,लेकिन जिस खूबी से जावेद अख्तर ने इसे लिखा है, निस्संदेह हीं नास्तिकों पर भी असर करने में यह समर्थ है। इस गाने से ए०आर०रहमान अपने रेंज का अनूठापन दर्शाते हैं।


२३ वीं पायदान -कभी कभी अदिति(जाने तू या जाने ना)

मीठी-सी पतली आवाज़ सुनकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि इस गाने को किसी २०-२२ साल के युवा ने आवाज़ नहीं दी,बल्कि ४२ साल के युवा(?) की मैच्युर आवाज़ है। जी हाँ, मैं रहमान की नई खोज राशिद अली की बात कर रहा हूँ। रहमान से राशिद अली की मुलाकात लगभग छह साल पहले हुई थी, बड़ी ही कैजुअल मुलाकात थी वह। इसके बाद रहमान के ट्रुप में राशिद गिटारिस्ट के तौर पर शामिल हो गए और "बाम्बे ड्रीम्स" की सफलता के भागीदार बने। यहाँ तक कि "कभी कभी अदिति" का गिटार पीस भी राशिद के म्युजिकल आईडियाज से प्रेरित है। इस गीत के बोल लिखे हैं "आती क्या खंडाला" फेम अब्बास टायरवाला ने।


२२ वीं पायदान -बाखुदा(किस्मत कनेक्शन)

आतिफ असलम(पहली नज़र फेम) की आवाज़ का जादू खुद हीं सर चढकर बोलता है,उस पर अल्का याग्निक की मीठी आवाज का तरका.... माशा-अल्लाह! इस गाने में प्रीतम अपने रंग में नज़र आते हैं। खुदा की गवाही देकर प्यार का इकरार करने की अदा काबिल-ए-तारीफ है, वैसे तो यह काम सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पहले हीं कर चुके हैं "खुदा गवाह" में। इस गीत के बोल लिखे हैं सब्बीर अहमद ने। वैसे तो यह फिल्म बाकस-आफिस पर कुछ खास नहीं कर सकी,लेकिन शाहरूख के बिना पहली मर्तबा अजीज मिर्जा को देखना अलग अनुभव दे गया। शाहिद और विद्या की जोड़ी भी लीक से हटकर लगी।


२१ वीं पायदान -जलवा(फैशन)

सलीम-सुलेमान जब "फैशन" के लिए टाईटल ट्रैक बना रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि "फैशन" से राईम करता हुआ (फैशन की तुक में) शब्द खोजना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है, तभी सलीम ने "जलवा" शब्द सुझाया। वही से आगे बढते हुआ बना "फैशन का है यह जलवा" और यह पंक्ति कमाल कर गई। मज़े की बात यह है कि "फैशन" फिल्म की पूरी कहानी इसी पंक्ति के इर्द-गिर्द घुमती है। इस गाने के बोल लिखे हैं अतिथि गीतकार "संदीप नाथ" ने और अपनी आवाज़ से सुसज्जित किया है सुखविंदर सिंह, सत्या हिंदुजा और रोबर्ट बौब ओमुलो ने। रैंप पर चलती प्रियंका,कंगना,मुग्धा और पृष्ठभूमि में बजता यह गीत रोमांचित कर देता है।



बाकी के गीत लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे।

सभी गानों को यहाँ सुनें:


चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

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3 श्रोताओं का कहना है :

राज भाटिय़ा का कहना है कि -

नव वर्ष की आप और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं !!!नया साल आप सब के जीवन मै खुब खुशियां ले कर आये,ओर पुरे विश्चव मै शातिं ले कर आये.
धन्यवाद

शुभम आर्य का कहना है कि -

नया साल आए बन के उजाला
खुल जाए आपकी किस्मत का ताला|
चाँद तारे भी आप पर ही रौशनी डाले
हमेशा आप पे रहे मेहरबान उपरवाला ||

नूतन वर्ष मंगलमय हो |

सजीव सारथी का कहना है कि -

लभ जंजुआ, बड़ा फनी नाम लगता है सुनने में पर एक बात है बन्दे में जितने भी गाने अब तक गाये हैं सब बेहद कामियाब रहे हैं. "मम्मा"...वाकई दसविदानिया क्या फ़िल्म है....जानते हैं जब से देखि है यही सोच रहा हूँ कि अगर मेरी ख्वाहिशिश कोई पूछता तो वो दस ख्वाहिशें क्या होंगी....कुछ सूझ नही रहा...पर जल्दी ही अपनी "टू-डू" सूची बना लूँगा.

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