रेडियो प्लेबैक वार्षिक टॉप टेन - क्रिसमस और नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित


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प्लेबैक की टीम और श्रोताओं द्वारा चुने गए वर्ष के टॉप १० गीतों को सुनिए एक के बाद एक. इन गीतों के आलावा भी कुछ गीतों का जिक्र जरूरी है, जो इन टॉप १० गीतों को जबरदस्त टक्कर देने में कामियाब रहे. ये हैं - "धिन का चिका (रेड्डी)", "ऊह ला ला (द डर्टी पिक्चर)", "छम्मक छल्लो (आर ए वन)", "हर घर के कोने में (मेमोरीस इन मार्च)", "चढा दे रंग (यमला पगला दीवाना)", "बोझिल से (आई ऍम)", "लाईफ बहुत सिंपल है (स्टैनले का डब्बा)", और "फकीरा (साउंड ट्रेक)". इन सभी गीतों के रचनाकारों को भी प्लेबैक इंडिया की बधाईयां

Sunday, May 31, 2009

तेरे ख्यालों में हम...तेरी ही बाहों में हम... डुबो देती है आशा अपनी आवाज़ में इस गीत के सुननेवालों को



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 97

दोस्तों, अभी कुछ दिन पहले हमने आपको वी.शांताराम की फ़िल्म 'नवरंग' का गीत सुनवाया था "तू छूपी है कहाँ, मैं तड़पता यहाँ" और बताया था कि इस गीत को रामलाल चौधरी की शहनाई के लिए भी याद किया जाता है। आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' भी रामलाल के संगीत से जुड़ा हुआ है मगर बतौर शहनाई वादक नहीं बल्कि बतौर संगीतकार। रामलाल भले ही साज़िंदे और सहायक के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, उन्होने दो-चार फ़िल्मों में संगीत भी दिया है, और उन्ही में से एक मशहूर फ़िल्म का एक गीत लेकर हम आज उपस्थित हुए हैं। इससे पहले कि आपको उस फ़िल्म और उस गीत के बारे में बतायें, रामलाल से जुड़ी कुछ बातें आपको बताना चाहेंगे। बतौर स्वतंत्र संगीतकार रामलाल को पहला मौका दिया था फ़िल्मकार पी. एल. संतोषी ने। साल था १९५० और फ़िल्म थी 'तांगावाला'। राज कपूर और वैजयंतीमाला अभिनीत इस फ़िल्म के कुल ६ गानें रामलाल बना चुके थे लेकिन दुर्भाग्यवश फ़िल्म आगे बनी नहीं। और रामलाल एक बार फिर फ़िल्म संगीत जगत में बतौर साज़िंदे बाँसुरी और शहनाई बजाने लगे। इसके बाद सन् १९५२ मे उनके हाथ एक बार फिर संगीतकार बनने का मौका लगा और बाल हरदीप की फ़िल्म 'हुस्नबानो' मे उन्होने संगीत दिया। और फिर उसके बाद आयी वी. शांताराम की ऐसी दो फ़िल्में जिन्होने यह साबित किया कि लोकप्रिय गीत बनाने में रामलाल भी उस दौर के दूसरे सफल संगीतकारों से कुछ कम नहीं थे। पहली फ़िल्म थी 'सेहरा' और दूसरी फ़िल्म थी 'गीत गाया पत्थरों ने'। और इसी दूसरी फ़िल्म का एक गीत आज आपको सुनवाया जा रहा है।

'गीत गाया पत्थरों ने' फ़िल्म आयी थी सन् १९६४ मे। इसमे शांतारामजी ने अपनी बेटी राजश्री को लौन्च किया था नवोदित नायक जीतेन्द्र के साथ। आज यह फ़िल्म याद की जाती है तो इसके गीत संगीत की वजह से। मुख्य रूप से आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ें सुनाई दी इस फ़िल्म के गीतों में ठीक 'नवरंग' के गीतों की तरह, लेकिन दो ख़ास आवाज़ें भी थीं इस फ़िल्म में। एक तो था सुविख्यात शास्त्रीय गायिका किशोरी अमोनकर की आवाज़ में फ़िल्म का शीर्षक गीत, और दो गीत थे गायक सी. एच. आत्मा की आवाज़ में। बहुत सालों के बाद आत्माजी की आवाज़ एक बार फिर से सुनाई दी और उनकी आवाज़ को सुनकर ऐसा लगा कि जैसे सहगल साहब भी फिर से वापस आ गए हों। बहरहाल आज हम 'गीत गाया पत्थरों ने' फ़िल्म का जो गीत चुना है उसे आशा भोंसले ने गाया है। "तेरे ख़यालों में हम तेरी ही बाहों में हम" एक उत्कृष्ट रचना है फ़िल्म संगीत इतिहास का, इसका श्रेय संगीतकार रामलाल और गायिका आशा भोंसले के साथ साथ गीतकार हसरत जयपुरी को भी जाता है। अफ़सोस की बात यह है कि इस फ़िल्म की कामयाबी के बावजूद रामलाल को किसी ने अपनी फ़िल्म में ख़ास संगीत देने का मौका नहीं दिया। उनके संगीत से सजी दो और फ़िल्में आयीं - 'नक़ाब-पोश' और 'नागलोक' जो नहीं चलीं। इसके बाद रामलाल ने ख़ुद फ़िल्मे बनाने की सोची। 'पन्ना पिक्चर्स' के बैनर तले उन्होने अपने सहभागी के साथ मिलकर 'त्यागी' नामक फ़िल्म का निर्माण शुरु किया, लेकिन उनके सहभागी ने बीच में ही उनका साथ छोड़ दिया जिससे उनको भारी नुकसान उठाना पड़ा। और इसके बाद किसी ने उन्हे फिर फ़िल्म बनाने का मौका ही नहीं दिया। तो दोस्तों, संगीतकार रामलाल की याद में प्रस्तुत है आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. नूरजहाँ की नशीली आवाज़ का जादू है ये गीत.
२. नौशाद साहब का संगीत है.
३. मुखड़े में शब्द है -"तराना".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी के लिए वाकई ये काफी आसान रहा होगा. मनु जी, और अवनीश जी का भी आभार. स्वप्न मंजूषा जी शायद पहली बार शामिल हुई कल और उन्होंने जवाब भी पूरे विवरण के साथ दिया. स्वागत है मंजूषा जी.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



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4 श्रोताओं का कहना है :

'अदा' का कहना है कि -

नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में मल्लिकाए तर्रन्नुम की मुझे एक ही फिल्म का पता है , उसका नाम है 'अनमोल घड़ी'
ये १९४६ में बनी थी, निर्देशक थे , महमूद साहब, और संगीत निर्देशन नौशाद साहब का था |

गीत है, 'जवां है मुहब्बत हसीं है जमाना लुटाया है दिल ने ख़ुशी का खजाना'

ये हो नहीं सकता क्योंकि इसमें मुखड़े में 'तराना' शब्द नहीं है |

'अदा' का कहना है कि -

माफ़ी चाहूँगी टाइपिंग में गलती हो गयी ,फिल्म 'अनमोल घड़ी' के निर्देशक महबूब खान साहब थे |

Parag का कहना है कि -

मुझे भी नूरजहाँ जी और नौशाद साहब की एक ही फिल्म पता है. अनमोल घड़ी में तो बहुत सारे गाने हैं मगर किसी गाने में तराना शब्द है क्या?
क्या मिल गया भगवान् मेरे दिल को दुखाके
आजा आजा मेरी बर्बाद मुहब्बत के सहारे
मेरे ख्याल से कोई और फिल्म का गाना हो सकता है.

पराग

'अदा' का कहना है कि -

पराग जी,
मैं भी इसी दुविधा में हूँ | 'अनमोल घड़ी' के किसी भी गाने में 'तराना' नहीं है | उपरलिखित गाने का ज़िक्र मैंने इस लिए किया, क्योंकि 'तराना' से मिलते जुलते शब्द हैं जैसे 'ज़माना', 'खजाना' लेकिन 'तराना' ?
हूँ हूँ हूँ !!!!
सोचना पड़ रहा है |

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